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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

परिचय - संगीता स्वरुप



मेरा परिचय क्या ? एक नगण्य रजकण के समान , विशाल सागर की मात्र एक बूंद । ब्लोगिंग ने एक प्लैटफार्म दिया जहां अपनी बात रख सकूँ । परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालने का प्रयास करती हूँ इसी लिए खुद को नदी सदृश्य समझती हूँ ।
कुछ विशेष नहीं है जो कुछ अपने बारे में बताऊँ...

दरिया हूँ मैं
मुझे बहने दो
बहना ही स्वाभाव है मेरा
उसे वैसे ही रहने दो
तुम चाहोगे कि
मुझे बाँध लोगे
और अथक प्रयास
से मुझे रोक लोगे
तो ये तुम्हारा
एक निरर्थक प्रयास है
कब बाँध पाई है
कोई नदी ?

तुम कहोगे कि -
मैं मानव पुत्र
"नदी को बाँध चुका हूँ
नहरें निकाल चुका हूँ
बिजली बना चुका हूँ "
पर मेरा प्रश्न है -
फिर उसके बाद ?

फिर से बही है नदी
अपने उसी रूप में
अपने गंतव्य की ओर
जाते हुए
इठलाते , बल खाते हुए
तुम रोक नही पाए उसे ।
इसीलिए कहती हूँ कि
जैसा जिसका स्वाभाव है
उसे वैसा ही रहने दो
मुझे भी बस
दरिया जैसा ही बहने दो ।
और यही निरंतर बहना मुझसे कुछ सृजन करवा जाता है --
मन के भावों को कैसे सब तक पहुँचाऊँ कुछ लिखूं या फिर कुछ गाऊँ । चिंतन हो जब किसी बात पर और मन में मंथन चलता हो उन भावों को लिख कर मैं शब्दों में तिरोहित कर जाऊं । सोच - विचारों की शक्ति जब कुछ उथल -पुथल सा करती हो उन भावों को गढ़ कर मैं अपनी बात सुना जाऊँ जो दिखता है आस - पास मन उससे उद्वेलित होता है उन भावों को साक्ष्य रूप दे मैं कविता सी कह जाऊं.

नाम ----- संगीता स्वरुप
जन्म .... ७ मई १९५३
जन्म स्थान .. रुड़की ( उत्तर प्रदेश )
शिक्षा ... स्नातकोत्तर ( अर्थशास्त्र )
व्यवसाय ... गृहणी ( पूर्व में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका रह चुकी हूँ )
शौक . हिंदी साहित्य पढ़ने का , कुछ टूटा फूटा अभिव्यक्त भी कर लेती हूँ
निवास स्थान ... दिल्ली

ब्लोग्स ----------- http://geet7553.blogspot.com/
http://gatika-sangeeta.blogspot.com/

मेल आई डी - sangeetaswarup@gmail.com

प्रकाशित पुस्तक -- उजला आसमां (२०११) ISBN - 978-81-909734-6-5.

साझा काव्य संग्रह - अनमोल संचयन , टूटते सितारों की उड़ान , शब्दों के अरण्य में , प्रतिभाओं की कमी नहीं

वटवृक्ष , गर्भनाल , अविराम साहित्यिकी पत्रिका में प्रकाशित कुछ रचनाएँ .

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपका व्‍यक्तित्‍व, आपकी कलम,
    आपका परिचय

    और ये पंक्तियां
    दरिया हूँ मैं
    मुझे बहने दो
    बहना ही स्वाभाव है मेरा
    उसे वैसे ही रहने दो
    बहुत कुछ कह‍ते हैं अच्‍छा लगा आपके बारे में विस्‍तार से जानकर ... आभार इस प्रस्‍तुति के लिए

    सादर

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  2. ब्लॉग जगत में कोई अपना मिला तो वो आप हो संगीता दी.....
    कहती दी हूँ पर लगती माँ सी हो :-)
    प्यारी...बहुत प्यारी....
    और वैसी ही लेखनी..
    शुभकामनाये आपको....
    स्नेह और आदर सहित..
    अनु

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  3. संगीताजी का व्यक्तित्व स्नेहिल और अपना लगता है ....
    उनके उत्कृष्ट लेखन के तो ब्लॉगजगत में सभी कायल हैं....

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  4. जैसा प्यारा परिचय है वैसा ही लेखन ||आशा

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  5. एक गरिमापूर्ण और सौम्य व्यक्तित्व

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  6. संगीता जी आपको जितना जाना समझा है आपके स्नेहिल एवं गरिमामय व्यक्तित्व ने उतना ही प्रभावित किया है ! दरिया सा धीर गंभीर अनवरत प्रवाहमान आपका यह परिचय बहुत अच्छा लगा ! शुभकामनायें !

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  7. गरिमामयी शिक्षिका एवं सरल गृहणी, दोनो रूपों को रचनाओं में महसूस कर पाती हूँ...
    परिचय पढ़कर बहुत अच्छा लगा|

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  8. आप सभी का आभार ।
    वैसे तो इस काबिल न थे जो आप सबने कहा है
    इस ज़र्रानवाज़ी का हज़ार बार शुक्रिया है ।

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